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मौसल पर्व
अध्याय ५
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वैशम्पाय़न उवाच
मत्वात्मानमपराद्धं स तस्य; जग्राह पादौ शिरसा चार्तरूपः |  २१   क
आश्वासय़त्तं महात्मा तदानीं; गच्छन्नूर्ध्वं रोदसी व्याप्य लक्ष्म्या ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति