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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ५
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धृतराष्ट्र उवाच
चतुर्थे निय़ते काले कदाचिदपि चाष्टमे |  १०   क
तृष्णाविनय़नं भुञ्जे गान्धारी वेद तन्मम ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति