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सौप्तिक पर्व
अध्याय ५
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कृप उवाच
असम्भावितरूपं हि त्वय़ि कर्म विगर्हितम् |  १५   क
शुक्ले रक्तमिव न्यस्तं भवेदिति मतिर्मम ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति