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शल्य पर्व
अध्याय ४९
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वैशम्पाय़न उवाच
जैगीषव्यं न पश्यामि तं शंसत महौजसम् |  ४५   क
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं परं कौतूहलं हि मे ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति