शल्य पर्व  अध्याय ४९

वैशम्पाय़न उवाच

एवं विगणय़न्नेव स जगाम महोदधिम् |  १४   क
अन्तरिक्षचरः श्रीमान्कलशं गृह्य देवलः ||  १४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति