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वन पर्व
अध्याय ४९
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वैशम्पाय़न उवाच
अनक्षज्ञस्य हि सतो निकृत्या पापनिश्चय़ैः |  ३३   क
भार्या च मे सभां नीता प्राणेभ्योऽपि गरीय़सी ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति