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शान्ति पर्व
अध्याय ४९
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वासुदेव उवाच
मिथ्याप्रतिज्ञो राम त्वं कत्थसे जनसंसदि |  ५१   क
भय़ात्क्षत्रिय़वीराणां पर्वतं समुपाश्रितः ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति