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शान्ति पर्व
अध्याय ४९
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वासुदेव उवाच
चरुद्वय़ं गृहीत्वा तु राजन्सत्यवती तदा |  १४   क
भर्तुर्वाक्यादथाव्यग्रा मात्रे हृष्टा न्यवेदय़त् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति