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कर्ण पर्व
अध्याय ४८
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सञ्जय़ उवाच
मय़ि प्रतिश्रुत्य वधं हि तस्य; वलस्य चाप्तस्य तथैव वीर |  ३   क
आनीय़ नः शत्रुमध्यं स कस्मा; त्समुत्क्षिप्य स्थण्डिले प्रत्यपिंष्ठाः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति