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द्रोण पर्व
अध्याय ४८
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सञ्जय़ उवाच
पुनर्व्रह्मवसातीय़ाञ्जघान रथिनो दश |  ८   क
केकय़ानां रथान्सप्त हत्वा च दश कुञ्जरान् |  ८   ख
दौःशासनिरथं साश्वं गदय़ा समपोथय़त् ||  ८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति