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द्रोण पर्व
अध्याय ४८
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सञ्जय़ उवाच
वाजिभिश्चापि निर्जीवैः स्वपद्भिः शोणितोक्षितैः |  २७   क
सारोहैर्विषमा भूमिः सौभद्रेण निपातितैः ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति