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उद्योग पर्व
अध्याय ४८
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वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वा विराटनगरे भ्रातरं निहतं प्रिय़म् |  ३७   क
धनञ्जय़ेन विक्रम्य किमनेन तदा कृतम् ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति