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शल्य पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
ततस्ते वै महाभागा गत्वा तत्र सुसंशिताः |  २९   क
वृत्त्यर्थं फलमूलानि समाहर्तुं यय़ुः किल ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति