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शल्य पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
अस्मिन्खलु महाभागे शुभे तीर्थवरे पुरा |  २८   क
त्यक्त्वा सप्तर्षय़ो जग्मुर्हिमवन्तमरुन्धतीम् ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति