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शल्य पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
इदं च ते तीर्थवरं स्थिरं लोके भविष्यति |  २७   क
सर्वपापापहं सुभ्रु नाम्ना वदरपाचनम् |  २७   ख
विख्यातं त्रिषु लोकेषु व्रह्मर्षिभिरभिप्लुतम् ||  २७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति