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शल्य पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
हुताशनेन दग्धश्च यस्तस्याः काष्ठसञ्चय़ः |  २१   क
अकाष्ठमग्निं सा दृष्ट्वा स्वशरीरमथादहत् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति