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उद्योग पर्व
अध्याय ४७
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सञ्जय़ उवाच
निर्मोचने षट्सहस्राणि हत्वा; सञ्छिद्य पाशान्सहसा क्षुरान्तान् |  ७७   क
मुरं हत्वा विनिहत्यौघराक्षसं; निर्मोचनं चापि जगाम वीरः ||  ७७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति