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उद्योग पर्व
अध्याय ४७
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सञ्जय़ उवाच
अग्निं समिद्धं शमय़ेद्भुजाभ्यां; चन्द्रं च सूर्यं च निवारय़ेत |  ६७   क
हरेद्देवानाममृतं प्रसह्य; युद्धेन यो वासुदेवं जिगीषेत् ||  ६७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति