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उद्योग पर्व
अध्याय ४७
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सञ्जय़ उवाच
महाभय़े सम्प्रवृत्ते रथस्थं; विवर्तमानं समरे कृतास्त्रम् |  २५   क
सर्वां दिशं सम्पतन्तं समीक्ष्य; तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति