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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः स पृथिवीपालो दत्त्वा श्राद्धान्यनेकशः |  २१   क
प्रविवेश पुनर्धीमान्नगरं वारणाह्वय़म् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति