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अनुशासन पर्व
अध्याय ४७
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भीष्म उवाच
एकैव हि भवेद्भार्या वैश्यस्य कुरुनन्दन |  ५१   क
द्वितीय़ा वा भवेच्छूद्रा न तु दृष्टान्ततः स्मृता ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति