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शल्य पर्व
अध्याय ४६
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वैशम्पाय़न उवाच
यत्र राज्ञा कुवेरेण वरा लव्धाश्च पुष्कलाः |  २५   क
धनाधिपत्यं सख्यं च रुद्रेणामिततेजसा ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति