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शल्य पर्व
अध्याय ४६
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जनमेजय़ उवाच
यच्छ्रुत्वा पूतमात्मानं विजानामि तपोधन |  २   क
प्रहृष्टानि च रोमाणि प्रसन्नं च मनो मम ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति