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शल्य पर्व
अध्याय ४६
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वैशम्पाय़न उवाच
अभिषिक्तस्ततो देवैर्वरुणोऽपि महाय़शाः |  ११   क
सरितः सागरांश्चैव नदांश्चैव सरांसि च |  ११   ख
पालय़ामास विधिना यथा देवाञ्शतक्रतुः ||  ११   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति