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वन पर्व
अध्याय ४६
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वैशम्पाय़न उवाच
द्रोणकर्णौ प्रतीय़ातां यदि भीष्मोऽपि वा रणे |  ९   क
महान्स्यात्संशय़ो लोके न तु पश्यामि नो जय़म् ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति