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वन पर्व
अध्याय ४६
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सञ्जय़ उवाच
श्रुतं हि ते महाराज यथा पार्थेन संय़ुगे |  २२   क
एकादशतनुः स्थाणुर्धनुषा परितोषितः ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति