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शान्ति पर्व
अध्याय ४६
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वैशम्पाय़न उवाच
एकीकृत्येन्द्रिय़ग्रामं मनः संय़म्य मेधय़ा |  १८   क
शरणं मामुपागच्छत्ततो मे तद्गतं मनः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति