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शल्य पर्व
अध्याय ४५
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वैशम्पाय़न उवाच
एवं सुरद्विषोऽनेकान्वलवानातताय़िनः |  ७०   क
जघान समरे वीरः कार्त्तिकेय़ो महावलः ||  ७०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति