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सभा पर्व
अध्याय ४५
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दुर्योधन उवाच
यज्ञे तस्य महाराज पाण्डुपुत्रस्य धीमतः |  ३३   क
वैश्या इव महीपाला द्विजातिपरिवेषकाः ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति