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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४५
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वैशम्पाय़न उवाच
अहो धिगिति राजा तु विक्रुश्य भृशदुःखितः |  ४१   क
ऊर्ध्ववाहुः स्मरन्मातुः प्ररुरोद युधिष्ठिरः |  ४१   ख
भीमसेनपुरोगाश्च भ्रातरः सर्व एव ते ||  ४१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति