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शान्ति पर्व
अध्याय ४५
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वैशम्पाय़न उवाच
प्राप्य राज्यं महातेजा धर्मराजो युधिष्ठिरः |  ४   क
चातुर्वर्ण्यं यथाय़ोगं स्वे स्वे धर्मे न्यवेशय़त् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति