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शल्य पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
हंसजः पङ्कदिग्धाङ्गः समुद्रोन्मादनश्च ह |  ६३   क
रणोत्कटः प्रहासश्च श्वेतशीर्षश्च नन्दकः ||  ६३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति