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शल्य पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
एते चान्ये च वहवो महापारिषदा नृप |  १०८   क
उपतस्थुर्महात्मानं कार्त्तिकेय़ं यशस्विनम् ||  १०८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति