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विराट पर्व
अध्याय ४४
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कृप उवाच
आनुकूल्येन कार्याणामन्तरं संविधीय़ताम् |  ४   क
भारं हि रथकारस्य न व्यवस्यन्ति पण्डिताः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति