वन पर्व  अध्याय ४४

वैशम्पाय़न उवाच

तत्र स्म गाथा गाय़न्ति साम्ना परमवल्गुना |  २८   क
गन्धर्वास्तुम्वुरुश्रेष्ठाः कुशला गीतसामसु ||  २८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति