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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
विसर्जय़ति मां राजा गान्धारी च यशस्विनी |  २८   क
भवत्यां वद्धचित्तस्तु कथं यास्यामि दुःखितः ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति