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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
मातरौ ते तथैवेमे शीर्णपर्णकृताशने |  १८   क
मम तुल्यव्रते पुत्र नचिरं वर्तय़िष्यतः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति