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अनुशासन पर्व
अध्याय ४४
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भीष्म उवाच
प्रसिद्धं भाषितं दाने तेषां प्रत्यसनं पुनः |  ४४   क
ये मन्यन्ते क्रय़ं शुल्कं न ते धर्मविदो जनाः ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति