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कर्ण पर्व
अध्याय ४३
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सञ्जय़ उवाच
पश्य कर्णं रणे पार्थ श्वेतच्छविविराजितम् |  ३८   क
उदय़ं पर्वतं यद्वच्छोभय़न्वै दिवाकरः ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति