सभा पर्व  अध्याय ४३

दुर्योधन उवाच

वह्निमेव प्रवेक्ष्यामि भक्षय़िष्यामि वा विषम् |  २७   क
अपो वापि प्रवेक्ष्यामि न हि शक्ष्यामि जीवितुम् ||  २७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति