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कर्ण पर्व
अध्याय ४२
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सञ्जय़ उवाच
धृष्टद्युम्नोऽपि समरे द्रौणेश्चिच्छेद कार्मुकम् |  ३३   क
तदपास्य धनुश्छिन्नमन्यदादत्त कार्मुकम् |  ३३   ख
वेगवत्समरे घोरं शरांश्चाशीविषोपमान् ||  ३३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति