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सभा पर्व
अध्याय ४२
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वैशम्पाय़न उवाच
न वय़ं त्वामृते वीर रंस्यामेह कथञ्चन |  ४९   क
अवश्यं चापि गन्तव्या त्वय़ा द्वारवती पुरी ||  ४९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति