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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४२
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सूत उवाच
येन येन शरीरेण करोत्ययमनीश्वरः |  १७   क
तेन तेन शरीरेण तदवश्यमुपाश्नुते |  १७   ख
मानसं मनसाप्नोति शारीरं च शरीरवान् ||  १७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति