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शल्य पर्व
अध्याय ४०
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वैशम्पाय़न उवाच
स समीपगतो भूत्वा धृतराष्ट्रं जनेश्वरम् |  ७   क
अय़ाचत पशून्दाल्भ्यः स चैनं रुषितोऽव्रवीत् ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति