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वन पर्व
अध्याय ४०
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अर्जुन उवाच
भवगद्दर्शनाकाङ्क्षी प्राप्तोऽस्मीमं महागिरिम् |  ५८   क
दय़ितं तव देवेश तापसालय़मुत्तमम् ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति