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शान्ति पर्व
अध्याय ४०
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वैशम्पाय़न उवाच
ते प्रीता व्राह्मणा राजन्स्वस्त्यूचुर्जय़मेव च |  १८   क
हंसा इव च नर्दन्तः प्रशशंसुर्युधिष्ठिरम् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति