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आदि पर्व
अध्याय ४०
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सूत उवाच
ततस्तु ते तद्गृहमग्निना वृतं; प्रदीप्यमानं विषजेन भोगिनः |  ४   क
भय़ात्परित्यज्य दिशः प्रपेदिरे; पपात तच्चाशनिताडितं यथा ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति