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शल्य पर्व
अध्याय ४
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सञ्जय़ उवाच
सोऽहमेतादृशं कृत्वा जगतोऽस्य पराभवम् |  ४५   क
सुय़ुद्धेन ततः स्वर्गं प्राप्स्यामि न तदन्यथा ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति