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विराट पर्व
अध्याय ४
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धौम्य उवाच
लाभे न हर्षय़ेद्यस्तु न व्यथेद्योऽवमानितः |  ३१   क
असंमूढश्च यो नित्यं स राजवसतिं वसेत् ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति