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द्रोण पर्व
अध्याय ३८
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सञ्जय़ उवाच
न ह्यस्य समरे मुच्येदन्तकोऽप्यातताय़िनः |  १७   क
किमङ्ग पुनरेवान्यो मर्त्यः सत्यं व्रवीमि वः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति